सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस तरह के मुकदमों में चार्जशीट जमा होने के बाद 60 से 90 दिनों के भीतर आरोप तय किए जाने चाहिए. आरोप तय होने के तुरंत बाद गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए. अगर संभव हो तो बिना रुकावट रोज़ाना सुनवाई की जाए. बेवजह सुनवाई टालने और अगली तारीख देने से बचा जाए आदेश में यह भी कहा गया है कि सभी हाई कोर्ट अपने अधिकार क्षेत्र की निचली अदालतों में चल रहे दहेज से जुड़े मुकदमों की ट्रैकिंग की व्यवस्था बनाएं. इसके लिए हाई कोर्ट को एक डिजिटल डैशबोर्ड और ऑटोमैटिक अलर्ट सिस्टम तैयार करने को कहा गया है. इससे सालों से अटके केसों की पहचान हो सकेगी. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों और हाई कोर्टों से कहा है कि वह साल में 3 बार उसे रिपोर्ट भेजें.
आदेश की मुख्य बातें
चार्जशीट जमा होने के बाद 60 से 90 दिनों के भीतर आरोप तय किए जाएं.
आरोप तय होते ही गवाही की प्रक्रिया शुरू हो और रोज़ाना सुनवाई की कोशिश की जाए.
3 साल से ज़्यादा समय से लंबित केसों की जिला अदालतें हर महीने या तीन महीने में समीक्षा करें.
आरोप तय होते ही गवाहों के बयान और समन भेजने की योजना के लिए एक 'विटनेस कैलेंडर' बनाया जाए.
वकीलों या पक्षकारों को बेवजह अगली तारीख नहीं मिलेगी. सुनवाई टालने पर जज को लिखित में वजह बतानी होगी.
अगर आरोपी का वकील बार-बार अनुपस्थित रहता है या सुनवाई टालने की कोशिश करता है, तो कोर्ट किसी दूसरे वकील को एमिकस क्यूरी नियुक्त कर कार्यवाही को आगे बढ़ाए.
हाई कोर्ट में डिजिटल डैशबोर्ड बनेगा जो पुराने केसों की स्थिति और लंबित स्टेज पर अलर्ट देगा.
काउंसलिंग या मध्यस्थता सिर्फ सामान्य पारिवारिक विवादों में होगी, हत्या या गंभीर हिंसा के मामलों में नहीं.
सभी राज्यों और हाई कोर्ट को हर साल 15 जनवरी, 15 मई और 15 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट देनी होगी



